Sunday, November 29, 2009

सहीद यशोधर बेंजवाल



खटीमा मसूरी और रामपुर तिराहा कांड के साथ श्रीयंत्र टापू कांड भी उत्तराखंड आन्दोलन मैं एक प्रमुख घटना थी जिसने आन्दोलन मैं अपनी सबसे जोरदार उपस्थिति दर्ज की था, १० नवम्बर १९९५ को श्रीयंत्र टापू श्रीनगर गढ़वाल में घटे इस मार्मिक घटना में दो आंदोलनकारी सहीद यशोधर बेंजवाल और राजेश रावत भी सहीद हुए, आन्दोलन के डोर मैं पुलिसिया अत्याचार की यहाँ सबसे शर्मनाक घटना थी.इसमें पुलिस द्वारा दोनों सहीदो के शवो को १० दिनों तक छुपा कर रखा था ..बाद मैं लगातार बड़ते जनाक्रोश मैं पुलिस ने अलकनंदा के तट पर दोनों की लाशो को फेक दिया था. ये रुद्रपर्याग जिले के दो उन अकेले सहीदो मैं से है जिनकी बदोलत आज हम उत्तराखंड मैं रह रहे है..इनका जनम बेंजी गाँव मैं श्री मित्रानंद बेंजवाल के घर मैं हुआ था . ये बेहद साधारण लेकिन देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना रखने वाले थे..मैं आन्दोलन के वक्त तिहाड़ जेल मैं लिखी कविता के कुछ अंश आपको भेज रहा हु...
चिल्लाने से नहीं पड़ा उनकी नींदों मैं खलाल
महलो के बंद किवाडो पर अब मुसल बरसाने होंगे
कौन तुम्हे अधिकार उपहार मैं देगा
ये ऐसा लोकतंत्र है जहा हमको भाले बरसाने होंगे

language:

English (UK)

Shid Yashodhar Benjwal Smrti Sansth

खटीमा मसूरी और रामपुर तिराहा कांड के साथ श्रीयंत्र टापू कांड भी उत्तराखंड आन्दोलन मैं एक प्रमुख घटना थी जिसने आन्दोलन मैं अपनी सबसे जोरदार उपस्थिति दर्ज की था, १० नवम्बर १९९५ को श्रीयंत्र टापू श्रीनगर गढ़वाल में घटे इस मार्मिक घटना में दो आंदोलनकारी सहीद यशोधर बेंजवाल और राजेश रावत भी सहीद हुए, आन्दोलन के डोर मैं पुलिसिया अत्याचार की यहाँ सबसे शर्मनाक घटना थी.इसमें पुलिस द्वारा दोनों सहीदो के शवो को १० दिनों तक छुपा कर रखा था ..बाद मैं लगातार बड़ते जनाक्रोश मैं पुलिस ने अलकनंदा के तट पर दोनों की लाशो को फेक दिया था. ये रुद्रपर्याग जिले के दो उन अकेले सहीदो मैं से है जिनकी बदोलत आज हम उत्तराखंड मैं रह रहे है..इनका जनम बेंजी गाँव मैं श्री मित्रानंद बेंजवाल के घर मैं हुआ था . ये बेहद साधारण लेकिन देश और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना रखने वाले थे..मैं आन्दोलन के वक्त तिहाड़ जेल मैं लिखी कविता के कुछ अंश चिल्लाने से नहीं पड़ा उनकी नींदों मैं खलाल

महलो के बंद किवाडो पर अब मुसल बरसाने होंगे

कौन तुम्हे अधिकार उपहार मैं देगा ये ऐसा लोकतंत्र है

जहा हमको भाले बरसाने होंगे



ठेठ पहाड़ी

गर्व से कहो की हम पहाड़ी हैं....आज की युवा पीड़ी सचमुच गुमशुदा जैसी है अपने नाम के आगे अपनी टाइटल लिखने में शर्म आती है इनको और पहाड़ी कहलाने में भी हिचकिचाते हैं ......उत्तराँचल या उत्तराखंडी कहलाने मेंगिलानी होती है इनको ..... अपनी बोली बोलने में कठिनाई महसूस होती है इनको ..... और अपने आदमी से तो मिलने में ही इनको परेशानी महसूस होती है बोली बोलना तो दूर की बात हैएक दूसरे को पूछते भी नही की तुम "कि भेजी नमस्कार.... तुम कै गांवा का छा" इतनी मीठी बोली है हमारी मिश्री से भी भी मीठी फ़िर भी गिट पिट गिट पिट अंग्रेजी बोलने में देरी नही करते हैंअपनी मर्यादा परम्परा का तो इनको अहसास ही नही हमारे विद्वानों का नाम भी नही मालूम इनको ...अपने आप को पहचान करने की कोशिश नही करतेहमारा सुंदर खानपान का ज्ञान नही इनको इनके पूर्वजो ने "बाड़ी" और "पल्यो" खाके इनको पला बड़ा किया अच्छी शिक्षा दी इनको और इस काबिल बनाया इनको की ये देश विदेश की सैर कर रहे हैं ५ स्टार होटलों में मजे कर रहे हैं जहाजो से सफर कर रहे हैं और डॉलर कमा रहे हैं इज्जत है इनकी फ़िर भी अपने धरातल से जुडे हुए नही हैं ये लोगऔर इनके बाद वाली संतान कैसी होगी इसकी परिकल्पना भी नही कर रहे हैं. भैजी, दीदी काका जी बोडा जी आदि शब्दों का इस्तेमाल भी नही करते हैं और तो और पहाड़ी गाना सुन ने का शौक रखते हैं लेकिन गुन गुनाते नही अपने ऋषि मुनिओं के नाम तक नही मालूम नही इनको.... गोत्र क्या होते हैं ये भी नही मालूम हमारे गाँव के भोजन व्यंजन तक नही मालूम और नही इनको मालूम की उत्तराँचल में कितनी कौथिक होते हैंऔर हाँ "बद्दनाथ" "नागार्जुन" "कालिंका" "गोरिल" "भगवती देवी" आदि आदि भी इनको मालूम नही जगर क्या होती है और क्यों लगायी जाती है ये भी नही मालूम इन देवी देवतावों के नाम से रोंगटे खडे हो जाते हैं पर स्वयं का पहाड़ी होने पर भी इनको कोई गर्व नही है मेरी तो प्रार्थना है भगवान् से की हे इश्वर इनको सदबुद्धी


आप सभी जू भी मेरी आईडी पर ओनादा गढ़वाल और गढ़वाली संस्कृति का बार माँ अगर कुछ जड़न चंदा छीन ता मेरी एल्बम देखि सकदा छीन मैं प्रयास करी चा की आपते कुछ सी बात बतैयी जो जू हमरा घर गाँवों माँ आज भी जीवित छीन कुलमिले की हमरी धरोहरों ते सजोनु कू प्रयास चा. मैं ते ये काम कन खुसी होंदी चा और मैं चंदू हम लोग कखकी भी रो अपुरी मात्रभूमि की याद हम दगडी रो...ता आप कू स्वागत चा पहाड़ का एक साधारण सा मनखी का होमपेज माँ.....